गुड की डली है मां

गुड की डली है मां

मेरे तन मन की मिट्टी में प्राण बनकर घुली है मां
नमक जैसी जरूरी और कभी गुड की डली है मां

कई शाखें अकेली जड़ ध्यान सबका दुआ सबको
कभी नींदों को लोरी है कभी कड़वी दवा लब को
अन्धेरे रास्तों पर रोशनी की इक गली है मां
नमक जैसी जरूरी और कभी गुड की डली है मां

नहीं बहने दिया मां ने कभी आखों अन्जा काजल
तपा मौसम तो अपनी आँख को ही कर लिया बादल
लपट लू से बचाती जो हवा वो सन्दली है मां
नमक जैसी जरूरी और कभी गुड की डली है मां

श्रवण हो या न हो बेटा मगर मां है हमेशा मां
नीड़ के हर इक पन्छी में बसी रहती है उसकी जां
छोड़ जबसे गये अपने छाँव में भी जली है मां
नमक जैसी जरूरी और कभी गुड की डली है मां

समय रीते मगर रीते नहीं आशीष की गगरी
सदा करती रहे छाया भरी ये प्रीत की बदरी
कई जन्मो के पुण्यो से फली गंगाजली है मां।
नमक जैसी ज़रूरी और कभी गुड की डली है मां

-अंजू जैन

Comments are closed.