गांव की चौपाल में

गांव की चौपाल में

कुछ ऐसे भरमाये मन शहरी इंदर जाल में
बस ये ही चर्चा है अब गांव की चौपाल में


गमलो मे यहां उगते हैं पीपल और बरगद
मनी प्लांट सी इच्छाये भूली है अपनी हद
पावनता तुलसी की डूबी मदिरा के ताल में ।


जीवन में आधुनिकता का लागा ऐसा घुन
पी गई संवेदना को अब ये पैसे की धुन
उलझन है बस उलझन अब इस धरती की चाल में।


बारूद में झुलसे हैं सब फूल पलाशो के
अब दूर हुए मंजर सब खील बताशो के
अंधियारे आ बैठे हैं, खुद पूजा के थाल में।


-अंजू जैन

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