यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ

यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ

भूले-बिसरे दिन याद दिलाता हूँ
यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ


मेरे घर भूले से सुख आता तो
इससे बढ़कर अपमान नहीं होता
आँसू का मोल अगर मिल पाता तो
मुझसे बढ़कर धनवान नहीं होता
जो रोज़ बिका करते थे मंडी में
उनसे अपनी बोली लगवाता हूँ
यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ


बिन बोले ही तुम इतना बोल गए
मैं बोल-बोल कर हुआ हूँ अब तो मौन
मेरे द्वारा ही जग तुमको जाना
अब तुम्हीं पूछते मुझसे, मैं हूँ कौन
जिस बस्ती का था मैं ही निर्माता
उससे अपना परिचय करवाता हूँ
यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ


सपनों में भी जो सदा रहा अपना
वह अपना भी अब केवल सपना है
सैकिण्ड की सूईं की तरह शायद
लगता जीवन भर मुझे भटकना है
यह मेरी नियति है या कि लाचारी
विश्वासी के हाथों विष पाता हूँ
यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ


सोचो क्या थे तुम, और आज क्या हो
मैंने तुमको क्या से क्या बना दिया
ठोकर खाते जो राहों के पत्थर
मैंने तराश कर ईश्वर बना दिया
बेबस पीड़ा को कोई क्या जाने
हर पत्थर को मैं शीश झुकाता हूँ
यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ


मत इतराओ अपनी इस हस्ती पर
मन में हो पाप, वह संत नहीं होता
मत मुझे चिढ़ाओ मेरी पस्ती पर
सूर्यास्त सूर्य का अंत नहीं होता
सूरज जैसा मैं कभी दहकता था
तारों द्वारा धमकाया जाता हूँ
यह गीत आख़िरी तुम्हें सुनाता हूँ


जिन आँखों में सब मुझे देखते थे
उन आँखों में सब हैं, मैं कहीं नहीं
किस चौराहे पर भटका, बतला दो
शायद ख़ुद को मैं ढूंढूँ वहीं कहीं
तुमने ऐसा ये सबक़ सिखाया है


- सुरेन्द्र शर्मा




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