मुझसे नाराज़ है माँ

मुझसे नाराज़ है माँ

साँसों का स्पंदन है वह जीवन का अहसास है माँ
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा क्या जिसके दिल के पास है माँ
घी-चीनी वर्जित है तुझको क्या पकवान खिलाएगा?
जितनी तेरी उम्र हुई है उतने तो उपवास है माँ!

दुनिया में आने की दस्तक के पहले अल्फाज़ हैं माँ
तू इतना जो बोल रहा है स्वर का प्रथम रियाज़ है माँ
भागीरथी नहाना है तो तू बस जाकर इतना पूछ
माँ तू इतनी गुमसुम क्यों है, क्या मुझसे नाराज़ है माँ

सूर-कबीरा-मीरा है वो काबा और कैलाश है माँ
रिश्ते सभी ज़रूरी हैं पर उनमें सबसे खास है माँ
कपड़े-लत्ते-गहने छोड़े माँ ने अपने सपने छोड़े
माँ को दौलत दिखा रहे हो याद रखो रैदास है माँ

जिनने अपनी माँ खो दी है उनसे पूछो खोना उसका
बिन मांगे आशीष मिलेंगे काफी है बस होना उसका
माँ ने मांगी बहुत मन्नतें मेरी भी इतनी ख़्वाहिश है
जीते जी मैं कभी न देखूँ छिपकर पलक भिगोना उसका

-महेश गर्ग बेधड़क

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