इस दिवाली में

इस दिवाली में

रहा है ख़ूबसूरत इस क़दर संसार दीपों का
लुभाता है हमेशा ही हमें व्यवहार दीपों का
बधाई फिर बधाई आपको इस बार दीपों की
कई खुशियाँ समेटे आ गया त्योहार दीपों का
अँधेरों से लड़े हैं एक दुश्कर जंग दीपों ने
सिखाये हैं हमें चलने के बेह्तर ढंग दीपों ने
चढ़ाये हैं गमों पर कुछ खुशी के रंग दीपों ने
चलो एक दीप ऐसा हम जलायें इस दिवाली में
कोई रोता हुआ चेहरा हँसायें इस दिवाली में

दुआ है ये सदा जलता रहे मधुमास का दीपक
चलो बनकर जलें हम भी किसी के आस का दीपक
अकारण ही हजारों के पटाखे फोड़ देते हैं
ग़रीबों को उसी के हाल पर क्यूँ छोड़ देते हैं
नहीं ऐसा नहीं हो आज भी क्रंदन करे कोई
किसी की चूभती बातों से भारी मन करे कोई
हो बेह्तर आज कम-से-कम नहीं उलझन करे कोई
कहीं भूखा हो कोई तो खिलायें इस दिवाली में
कोई रोता हुआ चेहरा हँसायें इस दिवाली में

अँधेरों ने किया कोशिश सदा फैले अँधेरा ही
सवेरों ने किया कोशिश सदा फैले सवेरा ही
अँधेरे को मिटाने का समूचा भार दीपक पर
बरसता है नहीं यूँ ही सभी का प्यार दीपक पर
नहीं डरते तमस फैला के रक्खे हैं अँधेरों ने
तिमिर को दूर करने की ली है बीड़ा सवेरों ने
मगर हमको डरा रक्खे हैं बारूदों के ढेरों ने
गिले-शिकवे सभी हम भूल जायें इस दिवाली में
कोई रोता हुआ चेहरा हँसायें इस दिवाली में

-सत्येन्द्र गोविन्द

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