शिकार ग़फ़लत का

शिकार ग़फ़लत का

इल्तिजा किस ज़बान से आती
अनसुनी आसमान से आती

वो हमेशा शिकार ग़फ़लत का
जो उसी के गुमान से आती

प्यार की खिल्लियाँ नहीं केवल
कुछ घृणा भी बयान से आती

ये हनक ये घमंड क्या कहना
जो बड़े खान-दान से आती

जान मेरी वहाँ बसा करती
जो जगह सौ घुमान से आती

हो गये दिन बहुत तुम्हें आये
इक सदा है विरान से आती

दूसरे से निकाल देते वो
बात जो एक कान से आती

-केशव शरण 

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