तन्हा जी रहा हूँ
- Chirag Jain
- Jan, 15, 2022
- Kehsav Sharan
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दुखी, नाराज़, तन्हा जी रहा हूँ अकेले मयकदे में पी रहा हूँ निभाता धर्म दीपक का हृदय से हवा से त्रस्त तो काफ़ी रहा हूँ नहीं आती मुझे गिनती अधिक कुछ किसी की गिन गुनहगारी रहा हूँ उधर वो और भी हल्के पड़े हैं इधर मैं और भी भारी रहा हूँ दमन, शोषण न होता तो भला क्यों बिना कारण न मैं बाग़ी रहा हूँ उधर क्या क्रांति का है हाल लोगो ! इधर जब मैं लटक फाँसी रहा हूँ किसी दिन याद आऊँगा तुम्हें मैं तुम्हारा एक दिन साथी रहा हूँ -केशव शरण
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