जो भी जिसके पास था…

जो भी जिसके पास था…

कीचड़ उसके पास था, मेरे पास गुलाल।
जो भी जिसके पास था, उसने दिया उछाल।।
 
जली होलियाँ हर बरस, फिर भी रहा विषाद।
जीवित निकली होलिका, जल-जल मरा प्रह्लाद।।

पानी तक मिलता नहीं, कहाँ हुस्न और जाम।
अब लिक्खें रूबाइयाँ, मियाँ उमर खय्याम।।
 
होरी जरे ग़रीब की, लपट न उठने पाय।
ज्यों दहेज बिन गूजरी, चुपचुप चलती जाय।।

वो सहमत और फाग से, वे भी मेरे संग!
कभी चढ़ा है रेत पर, इंद्रधनुष का रंग!!

आज तलक रंगीन है, पिचकारी का घाव।
तुमने जाने क्या किया, बड़े कहीं के जाव।।

उनके घर की देहरी, फागुन क्या फगुनाय।
जिनके घर की छाँव भी, होली-सी दहकाय।।

जिन पेड़ों की छाँव से, काला पड़े गुलाल।
उनकी जड़ में बावरे, अब तो मट्ठा डाल।।

तू राजा है नाम का, रानी के सब खेत।
उनको नखलिस्तान है, तुमको केवल रेत।।

© माणिक वर्मा

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