मुँह खोलो

मुँह खोलो

जंगल में आतंक मचा है मुँह खोलो
बहुत हुआ; अब इंक़लाब के सुर बोलो
या फिर शेरों की चंपी से फ़ारिग़ हो
भेड़ों पर उस्तरा चलाकर ख़ुश हो लो

-महेश गर्ग बेधड़क

Comments are closed.